प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को अपने दूसरे कार्यकाल के 75 दिन पूरे होने पर आईएएनएस के साथ विस्तार से बात की। उन्होंने अपनी आगे की प्राथमिकताओं का जिक्र किया और जम्मू एवं कश्मीर, मेडिकल सुधार, शिक्षा के महत्व के साथ-साथ नौकरशाही के अंदर से भ्रष्टाचार के ट्यूमर को निकालने जैसे कई संवेदनशील मुद्दों पर बात रखी।

आईएएनएस के एडिटर-इन-चीफ संदीप बामजई के साथ विस्तृत बातचीत में प्रधानमंत्री ने देश के सामने मौजूद सर्वाधिक विवादित मुद्दों और इन समस्याओं के निदान पर अपने विचार रखे।

आपने अपनी सरकार के 75 दिन पूरे किए हैं। हर सरकार इस तरह के मील के पत्थरों के नंबरों से गुजरती है और अपने द्वारा उठाए गए कदमों के बारे में बातें करती है। हम यह क्यों मानें कि आपकी सरकार अलग तरह की है?

–हमारी सरकार ने शुरुआती कुछ दिनों में ही अभूतपूर्व रफ्तार पकड़ ली। हमने जो हासिल किया, वह सरकार की स्पष्ट नीति, सही दिशा का परिणाम है। हमारी सरकार के प्रथम 75 दिनों में ही बहुत कुछ हुआ। बच्चों की सुरक्षा से लेकर चंद्रयान 2, भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई से लेकर तीन तलाक जैसी बुराई से मुस्लिम महिलाओं को मुक्त करना, कश्मीर से लेकर किसान तक, हमने दिखाया है कि मजबूत जनादेश वाली दृढ़संकल्प सरकार क्या कुछ हासिल कर सकती है। हमने जल आपूर्ति सुधारने और जल संरक्षण को बढ़ावा देने के एकीकृत दृष्टिकोण और एक मिशन मोड के लिए जलशक्ति मंत्रालय के गठन के साथ समय के सर्वाधिक जरूरी मुद्दे को सुलझाने के साथ शुरुआत की है।

क्या अभूतपूर्व जनादेश ने आपकी लोगों के प्रति इस प्रतिबद्धता को और मजबूत किया है कि सुधारों को जमीनी स्तर तक ले जाना है? और, आपने अपने राजनैतिक वजन का इस्तेमाल कार्यपालिका से परे जाकर किया और जनादेश का इस्तेमाल विधायिका में किया?

–एक तरह से, सरकार की जिस तरह जोरदार तरीके से सत्ता में वापसी हुई है, उसका भी यह परिणाम है। हमने इन 75 दिनों में जो हासिल किया है, वह उस मजबूत बुनियाद का परिणाम भी है, जिसे हमने पिछले पांच सालों के कार्यकाल में बनाया था। पिछले पांच सालों में किए गए सैकड़ों सुधारों ने यह तय किया है कि देश आज उड़ान भरने के लिए तैयार है, इसमें जनता की आकांक्षाएं जुड़ी हुई हैं। 17वीं लोकसभा के प्रथम सत्र ने रिकॉर्ड बनाया है। यह 1952 से लेकर अबतक का सबसे फलदायी सत्र रहा है। मेरी नजर में यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है, बल्कि बेहतरी का एक ऐतिहासिक मोड़ है, जिसने संसद को जनता की जरूरतों के प्रति अधिक जवाबदेह बनाया है। कई ऐतिहासिक पहलें शुरू की गईं, जिसमें किसानों और व्यापारियों के लिए पेंशन योजना, मेडिकल सेक्टर का रिफॉर्म, दिवाला एवं दिवालियापन संहिता में महत्वपूर्ण संशोधन, श्रम सुधार की शुरुआत..आदि आदि। मुद्दे का सार यह है कि अगर नीयत सही हो, उद्देश्य और कार्यान्वयन स्पष्ट हो तथा लोगों का सहयोग हो तो फिर कोई सीमा नहीं है कि हम क्या कुछ कर सकते हैं।”

मेडिकल सुधारों को लेकर चौतरफा चर्चा हो रही है। क्या आप समझते हैं कि आप जो बदलाव ला रहे हैं, उस पर अच्छी तरह से सोच-विचार किया गया है?

–जब हमने 2014 में सरकार बनाई थी, तो मेडिकल शिक्षा की वर्तमान प्रणाली के बारे में कई चिंताएं थीं। इससे पहले अदालतें भारत में मेडिकल शिक्षा को देख रहीं संस्थानों पर कड़ी टिप्पणियां कर रही थीं और उसे ‘भ्रष्टाचारियों की मांद’ करार दिया था। एक संसदीय समिति ने भी व्यापक अध्ययन किया और कहा कि मेडिकल शिक्षा की हालत खस्ताहाल है और इसमें कुप्रबंधन, पारदर्शिता की कमी और मनमानी की ओर इशारा किया गया था।

पहले की सरकारों ने भी इस सेक्टर में सुधार का विचार किया था, लेकिन वे इसे कर नहीं पाए। हमने फैसला किया कि इसे करेंगे, क्योंकि यह ऐसा मुद्दा नहीं है, जिसे हल्के में लिया जाए, क्योंकि यह हमारे लोगों के स्वास्थ्य से और हमारे युवाओं के भविष्य से जुड़ा मुद्दा है। इसलिए इसमें क्या सुधार किया जाए, इसके लिए हमने एक विशेषज्ञ समूह का गठन किया। विशेषज्ञ समूह ने सिस्टम का सावधानीपूर्वक अध्ययन किया और समस्याओं और सुधार के क्षेत्रों के बारे में सलाह दिया। हम विशेषज्ञों के सुझावों के आधार पर ही वर्तमान विधेयक को लेकर आए हैं।

फिर इस विधेयक पर इतनी हायतौबा क्यों मची है?

–राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग का गठन दूरगामी सुधार के लिए किया गया है, जो प्रचलित समस्याओं को ठीक करने का प्रयास करता है। इसमें कई सुधार शामिल हैं, जो भ्रष्टाचार के खतरों पर अंकुश लगाते हैं और पारदर्शिता को बढ़ावा देते हैं। ऐसे समय में जब विभिन्न देश भारत को दुनिया में विकास की अगली लहर को बढ़ावा देने वाले देश के रूप में देख रहे हैं, हमने महसूस किया कि ऐसा केवल स्वस्थ आबादी के साथ ही संभव है। गरीबों को गरीबी के दुष्चक्र से मुक्त करने के लिए स्वास्थ्य में सुधार बहुत जरूरी है।

एनएमसी इस उद्देश्य को बहुत अच्छी तरह पूरा करता है। यह देश में मेडिकल शिक्षा के प्रबंधन में पारदर्शिता, जवाबदेही और गुणवत्ता सुनिश्चित करेगा। इसका लक्ष्य छात्रों पर बोझ कम करने, मेडिकल सीटों की संख्या बढ़ाने और मेडिकल शिक्षा की लागत कम करने का है। इसका मतलब है कि अधिक प्रतिभाशाली युवक एक पेशे के रूप में चिकित्सा को अपनाएंगे और इससे मेडिकल पेशेवरों की संख्या बढ़ाने में मदद मिलेगी। आयुष्मान भारत स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में क्रांति ला रहा है। यह विशेष रूप से छोटे और मझोले शहरों में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा के साथ ही जागरूकता बढ़ाने का काम कर रहा है। हम यह सुनिश्चित करने के लिए भी काम कर रहे हैं कि हर तीन जिलों पर कम से कम एक मेडिकल कॉलेज हो। स्वास्थ्य सेवा के बारे में बढ़ती जागरूकता, लोगों की बढ़ती आय और लोगों द्वारा आकांक्षी लक्ष्यों पर अधिक ध्यान देने के साथ ही हमें मांग को पूरा करने के लिए हजारों-लाखों डॉक्टरों की जरूरत है, खास तौर से ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों में। एनएमसी सभी हितधारकों के बेहतर परिणाम के लिए इन सभी मुद्दों पर ध्यान देगा। शैक्षणिक वर्ष 2019-20 में सरकारी कॉलेजों में किसी एक साल में सबसे ज्यादा सीटें बढ़ाई जाएंगी और करीब दो दर्जन नए मेडिकल कॉलेज खोले जाएंगे। हमारा रोडमैप स्पष्ट हैं -एक पारदर्शी, सुलभ और सस्ती चिकित्सा शिक्षा प्रणाली, जिससे स्वास्थ्य सेवा बेहतर हो सके।

युवा राष्ट्र के लिए शिक्षा बहुत जरूरी है। लेकिन आपकी सरकार के कार्यक्रमों में शिक्षा गायब है। सरकार इस बारे में क्या कर रही है?

–शिक्षा न सिर्फ बहुत जरूरी है, बल्कि प्रौद्योगिकी-उन्मुख, समावेशी, जनकेंद्रित और जनसंचालित विकास मॉडल के लिए कुशल मानव संसाधन के समग्र स्पेक्ट्रम में सबसे महत्वपूर्ण घटक है। इससे न केवल जीवन को सकारात्मक रूप से बदलने की क्षमता है, बल्कि राष्ट्र के भविष्य पर भी इसका असर पड़ता है। हम शिक्षा के सभी पहलुओं पर काम कर रहे हैं। स्कूल के स्तर पर शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार, सीखने के परिणामों में सुधार, नवाचार और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने, अवसंरचना में सुधार, छात्रों के बीच समझ को बढ़ाने के लिए प्रौद्योगिकी के प्रयोग पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। हम स्कूली शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निग जैसी तकनीक का लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं। उच्च शिक्षा में, हम लगातार सीटें बढ़ाने, देश भर में प्रमुख संस्थानों की उपस्थिति बढ़ाने, संस्थानों को अधिक स्वायत्तता देने और अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने के लिए प्रयास कर रहे हैं। हमने एक उच्च शिक्षा वित्त पोषण एजेंसी (एचईएफए) की स्थापना की है, जिसे साल 2022 तक एक लाख करोड़ रुपये तक की धनराशि उपलब्ध कराई जाएगी। इसके लिए एक उच्च शिक्षा वित्त पोषण एजेंसी (एचईएफए) की स्थापना की है। इसमें से 21,000 करोड़ रुपये अब तक स्वीकृत किए जा चुके हैं। 52 विश्वविद्यालयों सहित 60 उच्च शैक्षणिक संस्थानों को स्वायत्तता दी गई है। ये विश्वविद्यालय यूजीसी के दायरे में रहेंगे, लेकिन उन्हें नए पाठ्यक्रम, कैंपस सेंटर, कौशल विकास पाठ्यक्रम, अनुसंधान पार्क और किसी भी अन्य नए शैक्षणिक कार्यक्रमों को शुरू करने की स्वतंत्रता होगी। उन्हें विदेशी फैकल्टी को नियुक्त करने, विदेशी छात्रों को दाखिला देने, फैकल्टी को प्रोत्साहन-आधारित मेहनताना देने, अकादमिक सहयोग में प्रवेश करने और ओपन डिस्टेंस लर्निग कार्यक्रम चलाने की भी स्वतंत्रता होगी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मिशन को आगे बढ़ाने में भी प्रगति हुई है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के पहले मसौदे को ब्लॉक और पंचायत स्तर से लाखों इनपुट और सुझाव मिले हैं। विभिन्न हितधारकों की प्रतिक्रिया और रुचि को देखते हुए, समिति परामर्श का एक और दौर चला रही है। इस तरह के व्यापक विचार-विमर्श के बाद तैयार की गई शिक्षा नीति का नवीनतम मसौदा फिर से अंतिम दौर के इनपुट के लिए सार्वजनिक डोमेन में रखा गया है। शिक्षा में सभी हितधारकों – राज्यों, माता-पिता, शिक्षकों, छात्रों, परामर्शदाताओं आदि से कई बार सलाह ली गई है। हमारा फोकस यह है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति को शिक्षाविदों, विशेषज्ञों और हितधारकों द्वारा संचालित किया जाना चाहिए, ताकि यह एक नीति न बने, बल्कि जल्द से जल्द व्यवहार में अपनाया जाए। भारत अपने विशाल जनसांख्यिकीय फायदों के साथ, दुनिया में एक अग्रणी ज्ञान अर्थव्यवस्था बनने की क्षमता रखता है।

भ्रष्टाचार को लेकर कुछ अहम फैसलों ने नौकरशाही में उथल पुथल मचा दी थी। आप क्या संदेश भेजना चाहते थे?

–भारत की आजादी के बाद से ही एक जो चीज हमें पीछे कर रही थी, वह भ्रष्टाचार है। भ्रष्टाचार ने किसी को नहीं छोड़ा। न गरीब को न अमीर को। लोग भ्रष्टाचार या तो लालच में या जल्दी पैसा कमाने के लिए या किसी मजबूरी में करते हैं। लेकिन ये लोग भी चाहते हैं कि भ्रष्टाचार रुक जाए। सभी के दिमाग में एक सवाल होता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की शुरुआत कौन करेगा और कहां से करेगा। भ्रष्टाचार से लड़ाई को हमेशा लोगों, मीडिया, संस्थाओं का समर्थन मिला है, क्योंकि सभी इस बात में एक राय रखते हैं कि भारत के विकास के सफर में भ्रष्टाचार बाधक है। और यह सिर्फ पैसे के सवाल नहीं हैं। भ्रष्टाचार धीरे-धीरे समाज को खोखला कर रहा है। चाहे सरकारी ऑफिस हो या बाजार। एक आदमी पुलिस स्टेशन जाता है तो वह पहले यह सोचता है कि उसे इंसाफ मिलेगा या नहीं। इसी तरह एक आदमी अगर बाजार से कुछ खरीद रहा तो उसे मिलावट का डर रहता है। हमने फैसला किया कि पहले दिन से भ्रष्टाचार का डर खत्म करेंगे। किसी को कहीं से शुरुआत तो करनी थी, हमने वह शुरुआत करने का फैसला किया, वह भी राजनीति के प्रभाव की चिंता किए बिना। परिणाण बताते हैं कि हम सफल रहे। न सिर्फ भ्रष्टाचार कम हुआ है, बल्कि समाज में भरोसा भी बढ़ा है। पिछले पांच साल में इंकम टैक्स रिटर्न भरने वालों की संख्या बढ़ गई है। हमने एक तय नीति से भ्रष्टाचार को कम किया और टैक्स भरने तथा रिफंड की प्रक्रिया को ऑनलाइन किया। पहले ऐसा होता था कि रिफंड इंकम टैक्स भरने वाले शख्स के खाते में सीधे पहुंच जाता था, वह भी बिना कोई इंसानी दखल के। हमने इसमें एक कदम आगे जाने का फैसला किया और लक्ष्य बनाया कि इनकम टैक्स रिटर्न के लिए फेसलेस असेसमेंट को हकीकत में लेकर आएंगे। यह कर प्रणाली में एक नए युग की शुरुआत जैसा है। हम इस बात को लेकर प्रतिबद्ध हैं कि हम न ही भ्रष्टाचार होने देंगे और न ही किसी तरह का शोषण बर्दाश्त करेंगे। इसलिए हमने मुश्किल कदम उठाए और बीते कुछ सप्ताहों में कुछ टैक्स अधिकारियों को कम्पलसरी रिटायरमेंट दे दिया। पहले कार्यकाल में भी हमें लगा तो हमने कई सरकारी अधिकारियों को हटाया था। हमने डीबीटी के माध्यम से तकनीक की ताकत का फायदा उठाया, जिससे हम 1.4 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की बचत करने में सफल रहे।

अनुच्छेद 370 हटाने के आपके फैसले की कई लोगों ने तारीफ की तो कुछ लोगों ने इसकी आलोचना भी की। इस समय लग रहा है कि एक अजीब-सी शांति है। आपको क्यों लगता है कि जम्मू एंव कश्मीर के लोग आपके साथ खड़े होंगे?

–कश्मीर पर लिए गए निर्णय का जिन लोगों ने विरोध किया, उनकी जरा सूची देखिए -असामान्य निहित स्वार्थी समूह, राजनीति परिवार, जो कि आतंक के साथ सहानुभूति रखते हैं और कुछ विपक्ष के मित्र। लेकिन भारत के लोगों ने अपनी राजनीतिक संबद्धताओं से इतर जम्मू एवं कश्मीर और लद्दाख के बारे में उठाए गए कदमों का समर्थन किया है। यह राष्ट्र के बारे में है, राजनीति के बारें में नहीं। भारत के लोग देख रहे हैं कि जो निर्णय कठिन ने मगर जरूरी थे, और पहले असंभव लगते थे, वे आज हकीकत बन रहे हैं। इस बात से अब हर कोई स्पष्ट है कि अनुच्छेद 370 और 35ए ने किस तरह जम्मू एवं कश्मीर और लद्दाख को पूरी तरह अलग-थलग कर रखा था। सात दशकों की इस स्थिति से लोगों की आकांक्षाएं पूरी नहीं हो पाईं। नागरिकों को विकास से दूर रखा गया। हमारा दृष्टिकोण अलग है – गरीबी के दुष्चक्र से निकाल कर लोगों को अधिक आर्थिक अवसरों से जोड़ने की आवश्यकता है। वर्षो तक ऐसा नहीं हुआ। अब हम विकास को एक मौका दें।

इस नई और बंधनमुक्त व्यवस्था में जो जम्मू एवं कश्मीर के लोगों के लिए आप क्या संदेश देना चाहते हैं जो भारत के भविष्य में सुधार के बारे में जानना चाहतें है, नौकरियां चाहते हैं और एक बेहतर जिंदगी चाहते हैं?

–जम्मू एवं कश्मीर और लद्दाख के मेरे भाई-बहन हमेशा एक बेहतर अवसर चाहते थे, लेकिन अनुच्छेद 370 ने ऐसा नहीं होने दिया। महिलाओं और बच्चों, एसटी और एससी समुदायों के साथ अन्याय हुआ। सबसे बड़ी बात कि जम्मू एवं कश्मीर और लद्दाख के लोगों के इनोवेटिव विचारों का उपयोग नहीं हो पाया। आज बीपीओ से लेकर स्टार्टअप तक, खाद्य प्रसंस्करण से लेकर पर्यटन तक, कई उद्योगों मे निवेश आ सकता है और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार पैदा हो सकता है। शिक्षा और कौशल विकास भी फलेगा-फूलेगा।

मैं जम्मू एवं कश्मीर के अपने बहनों और भाइयों को आश्वस्त करना चाहता हूं कि ये क्षेत्र स्थानीय लोगों की इच्छाओं, सपनों और महात्वाकांक्षाओं के अनुरूप विकसित किए जाएंगे। अनुच्छेद 370 और 35ए जंजीरों की तरह थे, जिनमें लोग जकड़े हुए थे। ये जंजीरे अब टूट गई हैं।”

जो लोग जम्मू एवं कश्मीर पर लिए गए निर्णय का विरोध कर रहे हैं, वे बस एक बुनियादी सवाल का उत्तर दे दें कि अनुच्छेद 370 और 35ए को वे क्यों बनाए रखना चाहते हैं?

उनके पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है। और ये वही लोग हैं, जो उस हर चीज का विरोध करते हैं जो आम आदमी की मदद करने वाली होती हैं। रेल पटरी बनती है, वे उसका विरोध करेंगे। उनका दिल केवल नक्सलियों और आतंकवादियों के लिए धड़कता है। आज हर भारतीय जम्मू एवं कश्मीर और लद्दाख के लोगों के साथ खड़ा है और मुझे भरोसा है कि वे विकास को बढ़ावा देने और शांति लाने में हमारे साथ खड़ा रहेंगे।

लेकिन क्या लोकतंत्र को लेकर चिंता नहीं है? क्या कश्मीर के लोगों की आवाज सुनी जाएगी?

–कश्मीर ने कभी भी लोकतंत्र के पक्ष में इतनी मजबूत प्रतिबद्धता नहीं देखी। पंचायत चुनाव के दौरान लोगों की भागीदारी को याद कीजिए। लोगों ने बड़ी संख्या में मत डाले और धमकाने के आगे झुके नहीं। नवंबर-दिसंबर 2018 में पैंतीस हजार सरपंच चुने गए और पंचायत चुनाव में रिकार्ड 74 फीसदी मतदान हुआ। पंचायत चुनाव के दौरान कोई हिंसा नहीं हुई। चुनावी हिंसा में रक्त की एक बूंद भी नहीं गिरी। यह तब हुआ जब मुख्यधारा के दलों ने इस पूरी प्रक्रिया के प्रति उदासीनता दिखाई थी। यह बहुत संतोष देने वाला है कि अब पंचायतें विकास और मानव सशक्तिकरण के लिए फिर से सबसे आगे आ गईं हैं। कल्पना कीजिए, इतने सालों तक सत्ता में रहने वालों ने पंचायतों को मजबूत करने को विवेकपूर्ण नहीं पाया। और यह भी याद रखिए कि लोकतंत्र पर वे महान उपदेश देते हैं लेकिन उनके शब्द कभी काम में नहीं बदलते।

इसने मुझे चकित और दुखी किया कि 73वां संशोधन जम्मू एवं कश्मीर में लागू नहीं होता। ऐसे अन्याय को कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है? यह बीते कुछ सालों में हुआ है जब जम्मू एवं कश्मीर में पंचायतों को लोगों को प्रगति की दिशा में काम करने के लिए शक्तियां मिलीं। 73वें संशोधन के तहत पंचायतों को दिए गए कई विषयों को जम्मू एवं कश्मीर की पंचायतों को स्थानांतरित किया गया। अब मैंने माननीय राज्यपाल से ब्लॉक पंचायत चुनाव की दिशा में काम करने का अनुरोध किया है। हाल में जम्मू एवं कश्मीर प्रशासन ने ‘बैक टू विलेज’ कार्यक्रम आयोजित किया जिसमें लोगों को नहीं बल्कि समूची सरकारी मशीनरी को लोगों तक पहुंचना पड़ा। वे केवल लोगों की समस्याओं को कम करने के लिए उन तक पहुंचे। आम नागरिकों ने इस कार्यक्रम को सराहा। इन प्रयासों का नतीजा सभी लोगों के सामने है। स्वच्छ भारत, ग्रामीण विद्युतीकरण और ऐसी ही अन्य पहलें जमीनी स्तर तक पहुंच रही हैं। वास्तविक लोकतंत्र यही है।

मैंने लोगों को आश्वस्त किया है कि जम्मू, कश्मीर में चुनाव जारी रहेंगे और केवल इन क्षेत्रों के लोग हैं जो वृहत्तर जनसमुदाय का प्रतिनिधित्व करेंगे। हां, जिन्होंने कश्मीर पर शासन किया, वे सोचते हैं कि यह उनका दैवीय अधिकार है, वे लोकतंत्रीकरण को नापसंद करेंगे और गलत बातें बनाएंगे। वे नहीं चाहते कि एक अपनी मेहनत से सफल युवा नेतृत्व उभरे। यह वही लोग हैं जिनका 1987 के चुनावों में आचरण संदिग्ध रहा है। अनुच्छेद 370 ने पारदर्शिता और जवाबदेही से परे जाकर स्थानीय राजनैतिक वर्ग को लाभ पहुंचाया। इसको हटाया जाना लोकतंत्र को और मजबूत करेगा।

आप ‘मैन वर्सेज वाइल्ड’ में नजर आए हैं। बतौर एक राजनेता इस बेहद अपरंपरागत शो में आने का क्या कारण रहा?

– कई बार किसी परंपरागत मुद्दे को उजागर करने के लिए कुछ अपरंपरागत करना अच्छा होता है। मुझे लगता है कि सही उद्देश्य के लिए बात करने और काम करने के लिए हर वक्त सही होता है। हर समुदाय, हर राज्य, हर देश, हर क्षेत्र के लिए कोई न कोई प्रमुख मुद्दा होता है। लेकिन मेरा मानना है कि पर्यावरण संरक्षण का मुद्दा समूह विशेष के सभी मुद्दों को मिलाकर देखा जाए तो उससे भी ज्यादा बड़ा होता है। यह आज हमारी धरती के हर इंसान, हर वनस्पति और हर पशु को प्रभावित कर रहा है। यह मनुष्य की परीक्षा की घड़ी है कि हम कितनी जल्दी और कितने प्रभावी तरीके से अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर पूरे विश्व के भले के बारे में सोचें।

भारत की प्रकृति के साथ सद्भावनापूर्व तरीके से रहने की महान परंपरा रही है। पूरे देश में, राज्यों में और विभिन्न संस्कृतियों में प्रकृति के विभिन्न पहलुओं को पवित्र माना जाता है। यह परंपरा स्वत: ही इसके संरक्षण में मदद करती है। एक प्रकार से यह हमारे देश में प्राकृतिक रूप से बना संरक्षण तंत्र है। हमारी परवरिश ही ऐसी है कि हमें प्रकृति के साथ मिलजुल कर रहने की सीख मिली हुई है। हमें केवल इन आदर्शो को याद रखने की जरूरत है। मुझे लगता है कि हम इसमें सफल भी हुए हैं, क्योंकि हाल ही में जारी हुए आंकड़े दिखाते हैं कि बाघों की संख्या में प्रभावशाली रूप से वृद्धि हुई है। यह कार्यक्रम भारत के सुंदर और समृद्ध वनस्पति जगत और जीव-जंतुओं को दुनियाभर में दर्शाने का एक माध्यम रहा। भारत में प्रकृति प्रेमियों के लिए असंख्य स्थान हैं, ऐसे तमाम स्थान हैं, जो विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों, विभिन्न प्रकार के वन्यजीवों से समृद्ध हैं।

पिछले पांच सालों में देश में आने वाले पर्यटकों की संख्या में करीब 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। मुझे पूरा भरोसा है कि बुनियादी ढांचे, कनेक्टिविटी और सुरक्षा को मजबूत करने के लिए बनाई गईं विभिन्न योजनाओं के साथ हम अतुल्य भारत की सुंदरता का अनुभव करने के लिए दुनियाभर से और भी ज्यादा पर्यटकों को आते देखेंगे।

आप कांग्रेस पार्टी के घटनाक्रम को कैसे देखते हैं, जहां राहुल गांधी के यह कहने के बाद कि वह नहीं चाहते कि किसी गांधी को अध्यक्ष पद मिले, सोनिया गांधी अध्यक्ष बन गईं?

– कांग्रेस में जो हुआ, वह उनके परिवार का आंतरिक मामला है। मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता।

2014 में यह माना जा रहा था कि आप खाड़ी देशों से दोस्ताना संबंध स्थापित नहीं कर पाएंगे, लेकिन हमने देखा है कि 2014 से खाड़ी देशों के साथ भारत के संबंधों में सुधार आ रहा है। वर्तमान में यह कहना गलत नहीं होगा कि खाड़ी देशों के साथ भारत के रिश्ते पिछले सात दशकों में सबसे अच्छे हैं। आप इसकी व्याख्या कैसे करते हैं?

– मुझे लगता है कि इसके दो पहलू हैं। पहला, लोगों का एक खास वर्ग मानता था कि मेरी सरकार और व्यक्तिगत रूप से मैं न केवल खाड़ी क्षेत्र में, बल्कि व्यापक संदर्भ में भी विदेश नीति के मोर्चे पर विफल हो जाऊंगा। जबकि सच्चाई यह है कि दुनियाभर में विदेश नीति में मेरी सरकार का सफल ट्रैक रिकॉर्ड सभी के सामने है। बल्कि, 2014 में प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद मेरी सरकार ने किसी पहले विदेश मंत्री के आधिकारिक दौरे का स्वागत किया था, तो वह थे ओमान के सुल्तान। इसलिए लोगों ने मेरे बारे में क्या सोचा और हकीकत में क्या हुआ, उस पर उन्हें आत्मचिंतन करना चाहिए। इसके बजाय मैं दूसरे पहलू पर ध्यान देना चाहता हूं, जो है -भारत के लिए खाड़ी क्षेत्र का महत्व।

इस क्षेत्र का भारत के साथ गहरा सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंध है। यहां 90 लाख भारतीय रहते हैं, जिनके द्वारा भेजे जाने वाले धन का हमारी अर्थव्यवस्था में अभूतपूर्व योगदान है और उन्होंने क्षेत्र की समृद्धि में भी अपार योगदान दिया है। मैंने देखा है कि खाड़ी देशों के नेता भारतीय प्रवासियों की मौजूदगी को काफी महत्व देते हैं और अभिभावक की तरह उनकी देखभाल करते हैं।

यह क्षेत्र हमारी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने में भी हमारा प्रमुख सहयोगी है। हमारा संबंध अब उनके साथ क्रेता-विक्रेता से भी कहीं ज्यादा बढ़कर है। यूएई ने हमारे रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व कार्यक्रम में हिस्सा लिया है और यूएई और सऊदी अरब दोनों भारत में विश्व के सबसे बड़े रिफाइनरी प्रोजेक्ट में निवेश करने वाले हैं। भारतीय कंपनियों को पहली बार क्षेत्र में ऑफशोर ऑयल फील्ड्स में अधिकार हासिल हुआ है।

मैंने क्षेत्र में सभी देशों के साथ अपने संबंध मजबूत करने के लिए हमारी विदेश नीति पर ध्यान देने के विशेष प्रयास किए हैं। आधिकारिक स्तर से लेकर राजनीतिक स्तर तक क्षेत्र में हमारी पहुंच बेमिसाल है। मैंने खुद कई बार क्षेत्र का दौरा किया है, और हमने भारत में क्षेत्र के कई नेताओं की मेजबानी की है।

दुनियाभर के जिन नेताओं से मेरी सबसे घनिष्ठ और गर्मजोशी भरी बातें होती हैं, उनकी बात करूं तो इनमें कई खाड़ी क्षेत्र के नेता हैं। हम नियमित रूप से संपर्क में रहते हैं। और, मुझे लगता है कि इस घनिष्ठता और नियमित संपर्क के कारण ही हमारी नीति काफी हद तक सफल हुई है। हमने किसी गलतफहमी या किसी संदेह को हमारे रिश्ते के बीच नहीं आने दिया। हम सभी देशों के साथ बेहद खुले रहे हैं और उन्होंने भी इसके बदले में हमारे साथ गर्मजोशी भरे और दोस्ताना संबंध कायम किए हैं।

मेरा दृढ़ विश्वास है कि भारत और खाड़ी देशों ने एक ऐसी साझेदारी की वास्तविक क्षमता को समझना शुरू किया है, जो आपसी लाभ से बढ़कर है और जो हमारे साझा और विस्तृत पड़ोसी क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि विश्वभर में शांति, विकास और समृद्धि ला सकती है।

2019 के चुनाव के दौरान, काफी लोगों ने भविष्यवाणी की थी कि आपको बहुमत हासिल नहीं होगा। कई लोगों ने कहा था कि 2014 का परिणाम उम्मीद से परे और अप्रत्याशित था। जब आप चुनाव प्रचार कर रहे थे, आपका मन क्या कह रहा था और आप जीत को लेकर कितना आश्वस्त थे?

– कुछ ऐसे लोग हैं, जो अपने पूर्वाग्रह, विचारधारा या किसी प्रकार की प्रतिबद्धताओं के कारण उन लोगों की हार को लेकर तर्क गढ़ लेते हैं, जिन्हें वे पसंद नहीं करते। एक ऐसा समय आता है, जब सच्चाई जमीन पर नजर आती है, लेकिन ये लोग उस सच्चाई को दरकिनार करना पसंद करते हैं। वे लोगों के मन में भ्रम पैदा करने के लिए झूठ और फर्जी आंकड़ों का सहारा लेते हैं।

ये ही वही लोग हैं, जो ऐसी बातें गढ़ते हैं कि भाजपा को बहुमत हासिल नहीं होगा, भाजपा सरकार बना लेगी, लेकिन उसे एक नए नेता की जरूरत है, भाजपा को नए गठबंधनों की जरूरत है, आदि आदि। ये लोग उन्हें भी बदनाम करते हैं, जो इनकी बात का समर्थन नहीं करते। ऐसे लोग बार-बार बेनकाब हुए हैं, लेकिन उनके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं हुआ। हमारे देश में इन लोगों द्वारा किए जाने वाले चुनावी विश्लेषणों में पार्टियों, संभावित गठजोड़ों, दशकों पुरानी केमिस्ट्री पर आधारित परिवारों के ग्लैमर को ध्यान में रखा जाता है। लेकिन लोगों और उनकी आकांक्षाओं को नजरअंदाज कर दिया जाता है। 2014 में और 2019 में भी जिन लोगों ने जनता से बात की और उनकी प्राथमिकताओं को जाना, वे जानते थे कि क्या हो रहा है।

जहां तक हमारा सवाल है, हम चुनाव जीतने के लिए काम नहीं करते, हम लोगों का विश्वास जीतने के लिए काम करते हैं। सरकारी धन से ज्यादा जनता के मन की ताकत होती है। हम लोगों के कल्याण पर ध्यान देते हैं, चुनाव परिणाम इसी का नतीजा होते हैं। पिछले 20 सालों से, मैं कई चुनाव अभियानों में सक्रिय रूप से शामिल रहा हूं और इनमें से ऐसा एक भी चुनाव नहीं था, जब मेरी हार की भविष्यवाणी नहीं की गई।

कई लोग हैं, जो सर्वनाश की भविष्यवाणी करते हैं और मैं उन्हें शुभकामनाएं देता हूं। विशेष रूप से 2019 की बात करूं तो मैं आपको बता सकता हूं कि मैं चुनाव में हमारी संभावनाओं को लेकर काफी आश्वस्त था। यह विश्वास हमारी सरकार के ट्रैक रिकॉर्ड, और हमने सुशासन और विकास के एजेंडे पर जिस प्रकार काम किया, उससे उपजा था।

मैं जहां कहीं भी गया, मैंने भाजपा और राजग के लिए भरपूर सहयोग देखा। लोगों ने यह तय कर लिया था कि 21वीं सदी में भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और वंशवाद की राजनीति स्वीकार्य नहीं है। हम विकास और प्रदर्शन की राजनीति के युग में रहते हैं, बयानबाजी और प्रतीकवाद के पुराने दौर में नहीं।

आपको इसका एक उदाहरण देता हूं -कांग्रेस पार्टी ने न्याय योजना के बारे में बात की। शायद यह सबसे बड़ा चुनावी वादा था, लेकिन लोगों ने ऐसे खोखले वादों को दरकिनार कर दिया। उन्हें कांग्रेस में ऐसे वादे को निभाने की ईमानदारी और क्षमता नहीं नजर आई। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि जिन लोगों ने 72,000 रुपये का वादा किया था, वे 72 सीटें भी नहीं जीत पाए।

–आईएएनएस

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